Ghughuti Tyar || घुघुती त्यार
उत्तराखंड में मकर संक्रांति सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि परंपराओं, लोककथाओं और आस्था का उत्सव है। हमारे देवभूमि उत्तराखंड में इस पर्व को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। कहीं इसे खिचड़ी संक्रांति, कहीं उत्तरेणी, कहीं गिंदी मेला कहा जाता है। इन्हीं अनोखी परंपराओं में से एक है कुमाऊं क्षेत्र में मनाया जाने वाला घुघुतिया त्योहार, जिसे लोग प्यार से घुघुती त्यार (Ghughuti tyar)भी कहते हैं।
घुघुती त्यार क्यों मनाया जाता है?
घुघुतिया त्योहार मूल रूप से मकर संक्रांति ही है, लेकिन इसे मनाने का तरीका इसे खास बना देता है। इस दिन आटे और गुड़ से बने विशेष पकवान तैयार किए जाते हैं, जिन्हें कुमाऊं में घुघुती या गुगुटी कहा जाता है। इन घुघुतियों को माला के रूप में पिरोकर बच्चों के गले में पहनाया जाता है, जो इस पर्व की सबसे सुंदर परंपरा मानी जाती है।
मकर संक्रांति की सुबह-सुबह बच्चे अपने घरों की छतों और आंगनों में निकल आते हैं और पूरे उत्साह के साथ कौवों को बुलाते हैं—
“काले कौवा काले, घुघुती माला खाले”
इस मधुर पुकार के साथ बच्चों द्वारा कौवों को घुघुती खिलाई जाती है। मान्यता है कि कौवे पूर्वजों और देवताओं के संदेशवाहक होते हैं, इसलिए उन्हें भोजन कराना शुभ माना जाता है।
घुगुती पहाड़ी डिश क्या है?
घुघुती (Ghughuti) उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों का एक पारंपरिक पकवान है, जो विशेष रूप से मकर संक्रांति के त्योहार पर बनाया जाता है. इस दिन को उत्तराखंड में ‘घुघुती त्यार’ के नाम से भी जाना जाता है.
यहाँ इस डिश की मुख्य विशेषताएं दी गई हैं:
- मुख्य सामग्री: इसे मुख्य रूप से गेहूं के आटे, सूजी, गुड़ (गुड़ का पानी) और सौंफ को मिलाकर बनाया जाता है. कुछ लोग इसमें घी का मोयन भी डालते हैं ताकि ये खस्ता बनें.
- आकार: इस आटे के मिश्रण से छोटी-छोटी लोइयां बनाकर उन्हें हाथ से बेलकर रोल किया जाता है और फिर ‘घुघुत’ पक्षी या डमरू जैसे विभिन्न आकारों में मोड़ा जाता है.
- बनाने की विधि: आकार देने के बाद इन्हें घी या तेल में तब तक तला जाता है जब तक कि ये सुनहरे भूरे और कुरकुरे न हो जाएं.
- सांस्कृतिक महत्व: मकर संक्रांति के दिन, बच्चे इन घुघुती की माला पहनते हैं और ‘काले कौवा’ को बुलाकर उन्हें यह पकवान खिलाते हैं. यह परंपरा पहाड़ों में प्रकृति और पक्षियों के प्रति प्रेम को दर्शाती है.
घुघुतिया त्योहार लोककथा
घुघुतिया त्योहार से जुड़ी एक बेहद लोकप्रिय लोककथा भी है। कहा जाता है कि कुमाऊं में चंद वंश के शासनकाल में राजा कल्याण चंद की कोई संतान नहीं थी। एक बार राजा-रानी बागेश्वर जिले के प्रसिद्ध बागनाथ मंदिर में पूजा करने पहुंचे। उनकी सच्ची श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र रत्न का आशीर्वाद दिया। इस बालक का नाम रखा गया घुघुती।
घुघुती के गले में हमेशा एक माला रहती थी, जिसमें बंधे घुंघरू मधुर आवाज करते थे। जब भी घुघुती किसी बात पर जिद करता, उसकी मां उसे मनाने के लिए वही पंक्तियां गाती—
“काले कौवा काले, घुघुती माला खाले”
कहा जाता है कि एक बार घुघुती किसी बड़े खतरे में पड़ गया। तब उसकी मां ने उसकी सलामती के लिए विशेष पकवान बनाए और देवताओं को अर्पित किए। यही पकवान आगे चलकर घुघुती के नाम से प्रसिद्ध हुए और तभी से कुमाऊं में घुघुतिया त्योहार मनाने की परंपरा शुरू हो गई।
हालांकि इस पर्व को लेकर और भी कई लोककथाएं प्रचलित हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों की जुबान पर जीवित हैं। यही लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत घुघुतिया त्योहार को कुमाऊं की पहचान बनाते हैं।
आज भी यह त्योहार बच्चों की मुस्कान, मां-बाप की भावनाओं और प्रकृति से जुड़े रिश्ते का प्रतीक है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और यह याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति कितनी समृद्ध और जीवंत है।
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आप सभी को मकर संक्रांति और घुघुतिया त्यार की हार्दिक शुभकामनाएं।





