उत्तराखंड अपनी विविध संस्कृति और अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। इन्हीं परंपराओं में से एक है हिलजात्रा (hiljatra)उत्सव, जो विशेष रूप से पिथौरागढ़ जिले में मनाया जाता है। इसे भगवान शिव की बारात का रूप भी माना जाता है।
हिलजात्रा में लोक नृत्य और मुखौटे
इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है मुखौटा नृत्य। ग्रामीण लोग बैलों का मुखौटा लगाकर नृत्य करते हैं और इनके संचालन के लिए “हलिया” होता है। कई जोड़ी मुखौटे बनाकर पूरा मैदान घूम-घूम कर नृत्य किया जाता है।
मुख्य रूप से इसमें दो बैल होते हैं –
- मरकल्या बल्द – जो सबसे ताकतवर और तेज माना जाता है।
- गाल्या बल्द – जो कमजोर होता है और बार-बार सो जाता है।
इन दोनों बैलों का प्रदर्शन न केवल ग्रामीण हास्य का प्रतीक है बल्कि यह सांस्कृतिक विविधता को भी दर्शाता है।
हिरन और देवी-देवताओं की झांकी
हिलजात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण है हिरन का मुखौटा नृत्य। इसमें एक व्यक्ति को हिरन का मुखौटा पहनाया जाता है और उसके पीछे बैठे लोग ढोल-नगाड़े बजाते हैं। दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे कोई असली हिरन मैदान में चर रहा हो। अंत में यह हिरन देवी-देवताओं के रूप में दर्शाया जाता है।
इसे पहाड़ी ड्रामा भी कहा जाता है और यह चीन के मुखौटा नृत्य की परंपरा से मेल खाता है। यही कारण है कि हिलजात्रा को एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है।
आस्था, विश्वास और कला का अद्भुत संगम
हिलजात्रा केवल एक त्योहार नहीं बल्कि आस्था, विश्वास और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इसमें न केवल धार्मिक आस्था झलकती है, बल्कि इतिहास, संस्कृति और कला का अद्भुत संगम भी दिखाई देता है।
राष्ट्रीय महत्व की परंपरा
हिलजात्रा उत्सव उत्तराखंड की पहचान है। जैसे हिमालयी क्षेत्र में मुखौटा नृत्य परंपरा प्रचलित है, वैसे ही हिलजात्रा पूरे देश में एक विशेष स्थान रखता है।





