उत्तराखंड अपनी संस्कृति और परंपराओं के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। इन्हीं परंपराओं में से एक है सातों-आठों का पर्व, जो कुमाऊँ क्षेत्र का एक प्रमुख लोकपर्व माना जाता है। इस त्यौहार को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। कहीं इसे गौरा-महेश्वर (शिव-पार्वती) के विवाह के रूप में मनाया जाता है तो कहीं गौरा (पार्वती) की विदाई के रूप में।
पर्व की मान्यता और विधि
इस पर्व के दौरान पाँच प्रकार के स्थानीय अनाज से प्रसाद तैयार किया जाता है और गाँव-गाँव में बाँटा जाता है। पर्व का स्वरूप किसी बेटी की विदाई जैसा होता है, जिसमें माता गौरा को मायके से पति महेश्वर (शिव) के साथ ससुराल विदा किया जाता है।
गाँव के लोग इस अवसर पर भावुक होकर माता गौरा की विदाई करते हैं और अगले वर्ष पुनः उनके मायके आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। यह लोकपर्व लोगों की आस्था और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है।

कब और कहाँ मनाया जाएगा सातों-आठों 2025?
यह त्यौहार विशेष रूप से पिथौरागढ़ और कुमाऊँ के सीमांत क्षेत्रों में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
- वर्ष 2025 में सातों-आठों पर्व 28 अगस्त 2025 को बिर्ड़ु पंचमी से शुरू होगा।
- 30 अगस्त 2025 को सातों और
- 31 अगस्त 2025 को आठों का पर्व मनाया जाएगा।
पर्व का महत्व
सातों-आठों न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि यह लोकजीवन में बेटी और दामाद के सम्मान का भी उत्सव है। यह पर्व सामूहिक मेलजोल, लोकगीतों, नृत्य और परंपराओं का अद्भुत संगम है, जो उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए रखता है।