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उत्तराखंड का लोकपर्व – घी संक्रांति

On: August 17, 2025 7:12 AM
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उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर में कई ऐसे पर्व शामिल हैं, जो न केवल धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हैं बल्कि सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी विशेष महत्व रखते हैं। इन्हीं में से एक है घी संक्रांति। इसे उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल दोनों ही क्षेत्रों में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।


📜 इतिहास और परंपरा

घी संक्रांति, भाद्रपद मास की संक्रांति को मनाई जाती है। इसे स्थानीय भाषा में ओलगिया भी कहा जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस दिन दान-पुण्य, पारिवारिक मेलजोल और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

कहा जाता है कि इस पर्व की शुरुआत कृषि प्रधान समाज में हुई थी। फसल पकने और घरों में अन्न-धन आने के बाद यह पर्व किसान और कारीगरों के बीच आपसी सहयोग और रिश्तों को मजबूत करने के लिए मनाया जाने लगा।


🍲 भोजन और विशेष व्यंजन

घी संक्रांति का नाम ही बताता है कि इस दिन का मुख्य आकर्षण है घी। इस दिन पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं जिनमें—

  • मांडवे की रोटी पर घी और भांग की चटनी
  • कचमा (खीरे) के साथ घी
  • गुड़ और घी
  • अरसे, पूआ और अन्य मिठाइयाँ

कहा जाता है कि इस दिन घी का सेवन करने से शरीर में शक्ति और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।


👨‍👩‍👧 सामाजिक महत्व

इस दिन किसान अपने हलिया (हल चलाने वाले मजदूर) और पशुपालक अपने ग्वालों को उपहार या अनाज देते हैं। इसे ओलग कहा जाता है। यह परंपरा आपसी सहयोग और कृतज्ञता की भावना को दर्शाती है।


🔬 वैज्ञानिक महत्व

  • घी संक्रांति के समय वर्षा ऋतु का अंत और शरद ऋतु का आरंभ होता है।
  • इस मौसम में शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा और पोषण की आवश्यकता होती है।
  • घी, गुड़ और अनाज जैसे खाद्य पदार्थ शरीर को रोगों से बचाने और ताकत देने में सहायक होते हैं।

🌿 निष्कर्ष

घी संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह हमें प्रकृति और परिश्रम के प्रति आभार व्यक्त करना सिखाता है। साथ ही, यह त्योहार हमें वैज्ञानिक रूप से स्वास्थ्य के महत्व की भी याद दिलाता है।

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